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Mirza Ghalib Shayari hindi and urdu

Mirza Ghalib Shayari hindi and urdu
Written by legend.robert

Mirza Ghalib Shayari hindi and urdu

शायरी मतलब मिर्ज़ा ग़ालिब अगर आप को भी शायरी में इंटरेस्ट है तो आप  मिर्ज़ा ग़ालिब का नाम जानते होंगे आप सब जानते हो बहुत सारे शायर आये है लेकिन सैड शायरी में मिर्ज़ा ग़ालिब का नाम बहुत जाना जाता है मैं आपको कुछ मिर्ज़ा ग़ालिब के बारे में कुछ बताने की कोशिस करता हूँ 

 

 मिर्ज़ा असदुल्लाह बेग खान जिनको हम सब लोग मिर्ज़ा ग़ालिब के नाम से जानते है इस मशहूर शायर का जन्म 27 दिसंबर 1797  15 फरबरी 1889 में हुआ ग़ालिब एक इंडियन शायर थे

ग़ालिब ने 11 साल की उम्र में कविता रचना शुरू कर दी थी। उनकी पहली भाषा उर्दू थी , लेकिन फ़ारसी और तुर्की भाषा भी बोली जाती थी। उन्होंने छोटी उम्र में फ़ारसी और अरबी में शिक्षा प्राप्त की । ग़ालिब की अवधि के दौरान, “हिंदी” और उर्दू शब्द पर्यायवाची थे ( हिंदी-उर्दू विवाद देखें )। ग़ालिब ने पर्सो-अरबी लिपि में लिखा था, जिसका उपयोग आधुनिक उर्दू लिखने के लिए किया जाता है, लेकिन अक्सर उनकी भाषा को “हिंदी” कहा जाता है; का शीर्षक Ode-e-Hindi (“हिंदी का इत्र”) था।

जब ग़ालिब अपने शुरुआती किशोरावस्था में थे, [ समय सीमा? ] ईरान से एक नया परिवर्तित मुस्लिम पर्यटक (अब्दुस समद, जिसे मूल रूप से होर्मुज़द, एक जोरास्ट्रियन नाम दिया गया था) आगरा आया था। [ किसके अनुसार? ] वह दो साल तक ग़ालिब के घर पर रहे और उन्हें फ़ारसी, अरबी, दर्शन और तर्क सिखाया।

ग़ालिब की प्रारम्भिक शिक्षा के बारे में स्पष्टतः कुछ कहा नहीं जा सकता लेकिन ग़ालिब के अनुसार उन्होने ११ वर्ष की अवस्था से ही उर्दू एवं फ़ारसी में गद्य तथा पद्य लिखना आरम्भ कर दिया था।[3] उन्होने अधिकतर फारसी और उर्दू में पारम्परिक भक्ति और सौन्दर्य रस पर रचनाये लिखी जो गजल में लिखी हुई है। उन्होंने फारसी और उर्दू दोनो में पारंपरिक गीत काव्य की रहस्यमय-रोमांटिक शैली में सबसे व्यापक रूप से लिखा और यह गजल के रूप में जाना जाता है।

मिर्ज़ा  ग़ालिब के बारे में तफ्सील से जान्ने के लिए यहाँ क्लिक करे  

न सोचा मैंने आगे,क्या होगा मेरा हशर,

तुझसे बिछड़ने का था,मातम जैसा मंज़र!

na socha maine aage, kya hoga mera hashar, 

tujhase bichhadane ka tha, maatam jaisa manzar!

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मोहबत को जो निभाते हैं उनको मेरा सलाम है,

और जो बीच रास्ते में छोड़ जाते हैं उनको,हुमारा ये पेघाम हैं,

“वादा-ए-वफ़ा करो तो फिर खुद को फ़ना करो,

वरना खुदा के लिए किसी की ज़िंदगी ना तबाह करो”

mohabat ko jo nibhaate hain unako mera salaam hai, 

aur jo beech raaste mein chhod jaate hain unako,humaara ye peghaam hain, 

“vaada-e-vafa karo to phir khud ko fana karo, 

varana khuda ke lie kisee kee zindagee na tabaah karo”

जब लगा था तीर तब इतना दर्द न हुआ ग़ालिब

ज़ख्म का एहसास तब हुआ 

जब कमान देखी अपनों के हाथ में।

Jab laga tha teer tab itna dard naa hua ghalib,

Zakhm ka ehsaas tab hua

Jab kamaan dekhi apno ke hath me.

हैरान हूँ तुझे मस्जिद में देख कर ग़ालिब 

ऐसा भी क्या हुआ जो खुदा याद आ गया 

hairaan hoon tujhe masjid mein dekh kar gaalib

 aisa bhee kya hua jo khuda yaad aa gaya

 

 

 

वाइज़!! तेरी दुआओं में असर हो तो मस्जिद को हिलाके देख। 

नहीं तो दो घूंट पी और मस्जिद को हिलता देख।। 

Vaiz teri Duwaon Me Asar Ho To Masjid Ko Hilake Dekh, 

Nahi To Do Ghut Pee Aur Masjid Hilata Dekh..

खैरात में मिली ख़ुशी मुझे अच्छी नहीं लगती ग़ालिब,

मैं अपने दुखों में रहता हु नवावो की तरह।

Khairat me mili khushi mujhe acchi nahi lgti ghalib,

Main apne dukho me rhta hu nawabo ki tarah.

इश्क़ ने ग़ालिब निकम्मा कर दिया। 

वर्ना हम भी आदमी थे काम के।। 

Ishq Ne Galib Nikamma Kar Diya, 

Warna Ham Bhi  Aadami The Kaam Ke..

हम तो फना हो गए उसकी आंखे देखकर गालिब,

न जाने वो आइना कैसे देखते होंगे।

Hum to fana ho gaye uski aankhe dekhkar ghalib,

Naa jane wo aaina kaise dekhte honge.

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क़र्ज़ की पीते थे मय लेकिन समझते थे कि हां।

रंग लावेगी हमारी फ़ाक़ा-मस्ती एक दिन।।

Karz Ki Peete The May, Lekin Samjhate The Ki Ha,n,

 Rang Lavegi Hamari Faka-Masti Ek Din.


न था कुछ तो ख़ुदा था कुछ न होता तो ख़ुदा होता।

डुबोया मुझ को होने ने न होता मैं तो क्या होता।।

N Tha Kuchh To Khuda Tha, Kuchh N Hota To Khuda Hota, 

Duboya Mujh Ko Hone Ne N Hota Main To Kya Hota..

आह को चाहिए एक उम्र असर होने तक

आह को चाहिए एक उम्र असर होने तक

कौन जीता है तेरे ज़ुल्फ़ के सर होने तक

आशिक़ी सब्र तलब और तमन्ना बेताब

दिल का क्या रँग करूँ खून-ए-जिगर होने तक

हम ने माना के तग़कुल न करोगे लेकिन

खाक हो जाएंगे हम तुम को खबर होने तक

ग़म-ए-हस्ती का ‘असद’ किससे हो कुज़-मर्ग-ए-इलाज

शमा हर रँग में जलती है सहर होने तक

aah ko chaahie ek umr asar hone tak hindi and urdu

aah ko chaahie ek umr asar hone tak

kaun jiitaa hai tere zulf ke sar hone tak

aashiqii sabr talab aur tamannaa betaab

dil kaa kyaa ra.Ng karuu.N khuun-e-jigar hone tak

ham ne maanaa ke taGakul na karoge lekin

khaak ho jaae.nge ham tum ko khabar hone tak

Gam-e-hastii kaa ‘asad’ kisase ho kuz-marg-e-ilaaj

shamaa har ra.Ng me.n jalatii hai sahar hone tak

बस के दुश्वार है हर काम का आसां होना

बस के दुश्वार है हर काम का आसां होना

आदमी को भी मयस्सर नहीं इन्सां होना

गिरिया चाहे है ख़राबी मेरे काशाने की

दर-ओ-दीवार से टपके है बियाबां होना

वा-ए-दीवानगी-ए-शौक़ के हर दम मुझको

आप जाना उधर और आप ही हैराँ होना

हैफ़ उस चार गिरह कपड़े की क़िसमत ग़ालिब

जिसकी क़िसमत में है आशिक़ का गरेबाँ होना

bas ke dushwaar hai har kaam kaa aasaa.n honaa HIndi and urdu

bas ke dushwaar hai har kaam kaa aasaa.n honaa

aadamii ko bhii mayassar nahii.n insaa.n honaa

giriyaa chaahe hai Karaabii mere kaashaane kii

dar-o-diiwaar se Tapake hai biyaabaa.n honaa

waa-e-diiwaanagii-e-shauq ke har dam mujhako

aap jaanaa udhar aur aap hii hairaa.N honaa

haif us chaar girah kapa.De kii qisamat Gaalib

jisakii qisamat me.n hai aashiq kaa garebaa.N honaa

दिल से तेरी निगाह जिगर तक उतर गई

दिल से तेरी निगाह जिगर तक उतर गई

दोनों को इक अदा में रज़ामंद कर गई

वो बाद-ए-सबा की सर्मस्तियाँ कहाँ

उठिए बस अब कि लज्जत-ए-ख़्वाब-ए-सहर गई

देखो तो दिल फ़रेब ये अंदाज़-ए-नक़्श-ओ-पा

मौज-ए-ख़िराम-ए-यार भी क्या गुल क़दर गई

नज़ारे ने भी काम किया वाँ नक़ाब का

मस्ती से हर निगाह तेरे रुख़ पर बिखर गई

मारा ज़माने ने असदुल्लाह ख़ाक में

वो वलवले, वो

वो वलवले कहाँ, वो जवानी किधर गई

dil se terii nigaah jigar tak utar ga_ii Hindi and urdu

dil se terii nigaah jigar tak utar ga_ii

dono.n ko ik adaa me.n razaama.nd kar ga_ii

vo baad-e-sabaa kii sar_mastiyaa.N kahaa.N

uThie bas ab ki lajjat-e-Kvaab-e-sahar ga_ii

dekho to dil fareb ye a.ndaaz-e-naqsh-o-paa

mauj-e-Kiraam-e-yaar bhii kyaa gul qadar ga_ii

nazaare ne bhii kaam kiyaa vaa.N naqaab kaa

mastii se har nigaah tere ruK par bikhar ga_ii

maaraa zamaane ne asadullaah Kaak me.n

vo valavale, vo

vo valavale kahaa.N, vo javaanii kidhar ga_ii

कोई उम्मीद बर नहीं आती !


कोई उम्मीद बर नहीं आती !

कोई सूरत नज़र नहीं आती !!

मौत का एक दिन मुअय्यन है !

नींद क्यों रात भर नहीं आती !!

आगे आती थी हाले-दिल पर हसी !

अब किसी बात पर नहीं आती !!

जानता हूँ सवाबे-ताअतो-जुहद !

पर तबियत इधर नहीं आती !!

है कुछ ऐसी ही बात जो चुप हूँ !

वरना क्या बात कर नहीं आती ?

क्यों न चीखू कि याद करते है !

मेरी आवाज़ गर नहीं आती !!

दाग़-ए-दिल गर नज़र नहीं आता !

बू भी ऐ चारागर नहीं आती !!

हम वहा है जहाँ से हमको भी !

कुछ हमारी खबर नहीं आती !!

मरते है आरजू में मरने की !

मौत आती है पर नहीं आती !!

काबा किस मुँह से जाओगे ग़ालिब !

शर्म तुमको मगर नहीं आती 

koi ummid bar nahi aati hindi and urdu

koi ummid bar nahi aati

koi surat nazar nahi aati

mout ka ek din muayyan hai

nind kyo rat bhar nahi aati

aage aati thi hale dil par hasi

ab kisi bat par nahi aati

janta hun sawabe-taato-zuhad

par tabiyat idhar nahi aati

hai kuch aisi hi baat jo chup hun

warna kya baat kar nahi aati ?

kyo n cheekhu ki yaad karte hai

meri aawaz gar nahi aati

Daagh-e-dil gar nazar nahi aata

Boo bhi ae charagar nahi aati

ham waha hai jaha se hamko bhi

kuch hamari khabar nahi aati

marte hai aarzoo me marne ki

mout aati hai par nahi aati

kaba kis muh se jaoge ghalib

sharm tumko magar nahi aati

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हज़ारों ख़्वाहिशें ऐसी कि हर ख़्वाहिश पे दम निकले

हज़ारों ख़्वाहिशें ऐसी कि हर ख़्वाहिश पे दम निकले

बहुत निकले मिरे अरमान लेकिन फिर भी कम निकले

डरे क्यूँ मेरा क़ातिल क्या रहेगा उस की गर्दन पर

वो ख़ूँ जो चश्म-ए-तर से उम्र भर यूँ दम-ब-दम निकले

निकलना ख़ुल्द से आदम का सुनते आए हैं लेकिन

बहुत बे-आबरू हो कर तिरे कूचे से हम निकले

मगर लिखवाए कोई उस को ख़त तो हम से लिखवाए

हुई सुब्ह और घर से कान पर रख कर क़लम निकले

हुई इस दौर में मंसूब मुझ से बादा-आशामी

फिर आया वो ज़माना जो जहाँ में जाम-ए-जम निकले

मोहब्बत में नहीं है फ़र्क़ जीने और मरने का

उसी को देख कर जीते हैं जिस काफ़िर पे दम निकले

कहाँ मय-ख़ाने का दरवाज़ा ‘ग़ालिब’ और कहाँ वाइ’ज़

पर इतना जानते हैं कल वो जाता था कि हम निकले

Hazaaron khavaahishen aisee ki har khavaahish pe dam nikale hindi and urdu


Hazaaron khavaahishen aisee ki har khavaahish pe dam nikale

bahut nikale mire aramaan lekin fir bhee kam nikale

ḍaare kyoon meraa qaatil kyaa rahegaa us kee gardan par

vo khaoon jo chashm-e-tar se umr bhar yoon dam-b-dam nikale

nikalanaa khauld se aadam kaa sunate aae hain lekin

bahut be-aabaroo ho kar tire kooche se ham nikale

magar likhavaa_e koii us ko khat to ham se likhavaa_e

huii subh aur ghar se kaan par rakh kar qalam nikale

huii is daur men mnsoob mujh se baadaa-aashaamee

fir aayaa vo zamaanaa jo jahaan men jaam-e-jam nikale

mohabbat men naheen hai pharqa jeene aur marane kaa

usee ko dekh kar jeete hain jis kaaphair pe dam nikale

kahaan may-khaane kaa daravaazaa ‘gaalib’ aur kahaan vaa_i’za

par itanaa jaanate hain kal vo jaataa thaa ki ham nikale

बाज़ीचा-ए-अतफ़ाल है दुनिया मेरे आगे

बाज़ीचा-ए-अतफ़ाल है दुनिया मेरे आगे

होता है शब-ओ-रोज़ तमाशा मेरे आगे

इक खेल है औरंग-ए-सुलेमाँ मेरे नज़दीक

इक बात है एजाज़-ए-मसीहा मेरे आगे

जुज़ नाम नहीं सूरत-ए-आलम मुझे मंज़ूर

जुज़ वहम नहीं हस्ती-ए-अशिया मेरे आगे

होता है निहाँ गर्द में सहरा मेरे होते

घिसता है जबीं ख़ाक पे दरिया मेरे आगे

मत पूछ कि क्या हाल है मेरा तेरे पीछे

तू देख कि क्या रंग है तेरा मेरे आगे

सच कहते हो ख़ुद-बीन ओ ख़ुद-आरा हूँ न क्यूँ हूँ

बैठा है बुत-ए-आइना-सीमा मेरे आगे

फिर देखिए अंदाज़-ए-गुल-अफ़्शानी-ए-गुफ़्तार

रख दे कोई पैमाना-ए-सहबा मेरे आगे

नफ़रत का गुमाँ गुज़रे है मैं रश्क से गुज़रा

क्यूँकर कहूँ लो नाम न उन का मेरे आगे

ईमाँ मुझे रोके है जो खींचे है मुझे कुफ़्र

काबा मेरे पीछे है कलीसा मेरे आगे

आशिक़ हूँ प माशूक़-फ़रेबी है मेरा काम

मजनूँ को बुरा कहती है लैला मेरे आगे

ख़ुश होते हैं पर वस्ल में यूँ मर नहीं जाते

आई शब-ए-हिज्राँ की तमन्ना मेरे आगे

है मौजज़न इक क़ुल्ज़ुम-ए-ख़ूँ काश यही हो

आता है अभी देखिए क्या क्या मेरे आगे

गो हाथ को जुम्बिश नहीं आँखों में तो दम है

रहने दो अभी साग़र-ओ-मीना मेरे आगे

हम-पेशा ओ हम-मशरब ओ हमराज़ है मेरा

‘ग़ालिब’ को बुरा क्यूँ कहो अच्छा मेरे आगे

Baazaeechaa-e-ataphaal hai duniyaa mere aage hindi and urdu

Baazaeechaa-e-ataphaal hai duniyaa mere aage

hotaa hai shab-o-roza tamaashaa mere aage

ik khel hai aurng-e-sulemaan mere nazadeek

ik baat hai ejaaza-e-maseehaa mere aage

juza naam naheen soorat-e-aalam mujhe mnzaoor

juza vaham naheen hastee-e-ashiyaa mere aage

hotaa hai nihaan gard men saharaa mere hote

ghisataa hai jabeen khaak pe dariyaa mere aage

mat poochh ki kyaa haal hai meraa tere peechhe

too dekh ki kyaa rng hai teraa mere aage

sach kahate ho khaud-been o khaud-aaraa hoon n kyoon hoon

baiṭhaa hai but-e-aainaa-seemaa mere aage

fir dekhie andaaza-e-gul-aphashaanee-e-guphataar

rakh de koii paimaanaa-e-sahabaa mere aage

napharat kaa gumaan guzare hai main rashk se guzaraa

kyoonkar kahoon lo naam n un kaa mere aage

iimaan mujhe roke hai jo kheenche hai mujhe kuphar

kaabaa mere peechhe hai kaleesaa mere aage

aashiqa hoon p maashooqa-pharebee hai meraa kaam

majanoon ko buraa kahatee hai lailaa mere aage

khaush hote hain par vasl men yoon mar naheen jaate

aaii shab-e-hijraan kee tamannaa mere aage

hai maujazan ik qaulzaum-e-khaoon kaash yahee ho

aataa hai abhee dekhie kyaa kyaa mere aage

go haath ko jumbish naheen aankhon men to dam hai

rahane do abhee saagar-o-meenaa mere aage

ham-peshaa o ham-masharab o hamaraaza hai meraa

‘gaalib’ ko buraa kyoon kaho achchhaa mere aage

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